फुटबॉल फील्ड से बड़ा साइज! पहली फ्लाइट बन गई थी आखिरी, हिटलर से बचने के लिए अमेरिका ने किया था डिजाइन

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नई दिल्ली।

दुनिया के एविएशन इतिहास में आज का दिन काफी खास है। 79 साल पहले आज ही के दिन दुनिया के सबसे बड़े विमानों में से एक एयरक्राफ्ट ने उड़ान भरी थी। यह लकड़ी से बना सबसे बड़ा विमान था। इसके डैनों का फैलाव फुटबॉल के मैदान से भी बड़ा था। इसे 700 से अधिक लोगों को युद्ध के मैदान में ले जाने के लिए डिजाइन किया गया था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान स्टील पर पाबंदी लगी थी, इसलिए यह एयरक्राफ्ट लकड़ी से बनाया गया था। लेकिन इसकी पहली उड़ान ही इसकी आखिरी उड़ान साबित हुई। यह प्रोटोटाइप से आगे नहीं बढ़ पाया। आखिर कहां उड़ा था यह विमान?अमेरिकी डिजाइनर हावर्ड ह्यूज ने 2 नवंबर 1947 को इस विमान को ह्यूज फ्लाइट बोट को उड़ाया था। यह उस समय सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट था जो पानी पर से उड़ान भर सकता था। इसे लैमिनेटेड बर्च और स्प्रूस की लकड़ी से बनाया गया था। इसी कारण इसे स्प्रूस गूज नाम दिया गया था। ह्यूज हॉलीवुड के सफल मूवी प्रोड्यूसर थे और साल 1932 में उन्होंने ह्यूज एयरक्राफ्ट कंपनी की स्थापना की थी। उन्होंने खुद ही अपनी कंपनी के एयरक्राफ्ट का डिजाइन तैयार किया था।

क्यों पड़ी जरूरत?

History.com के मुताबिक 1937 में इस विमान ने टेस्ट फ्लाइट में दो महाद्वीपों के बीच फ्लाइट टाइम का रिकॉर्ड बनाया था। उसके अगले साल यानी 1938 में ह्यूज ने इस विमान के जरिए तीन दिन, 19 घंटे और 14 मिनट के रिकॉर्ड समय में दुनिया का चक्कर लगाया था। उनकी इस उपलब्धि को देखते हुए अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उनकी कंपनी को एक ऐसा विमान बनाने को कहा जो सैनिकों और सामान के साथ लंबी दूरी की उड़ान भर सके। यह साल 1941 था।इसका मकसद सैनिकों और टैंक जैसे बड़े मिलिट्री साजोसामान को अटलांटिक के पार यूरोप पहुंचाना था। इसे इस तरह डिजाइन किया जाना था कि यह जर्मनी के तानाशाह हिटलर की पनडुब्बियों के हमले से बच सके। इस एयरक्राफ्ट की अवधारणा उद्योगपति हेनरी काइजर ने रखी थी लेकिन वह शुरुआत में ही इस प्रोजेक्ट से निकल गए। इसके बाद ह्यूज और उनकी छोटी टीम ने ही इस प्रोजेक्ट को पूरा कियायुद्ध के दौरान स्टील पर प्रतिबंध के कारण ह्यूज ने एक नया तरीका निकाला। उन्होंने लकड़ी पर प्लास्टिक का लैमिनेशन किया और इस पर फैब्रिक चढ़ा दिया। इसमें स्प्रूस की लकड़ी का व्यापक इस्तेमाल किया गया था। इसलिए स्प्रूस गूज के नाम से भी जाना जाता है। इसके डैनों का फैलाव 320 फीट था और इस पर आठ बड़े प्रॉपेलर इंजन लगे थे।

कितनी आई थी लागत?

इस एयरक्राफ्ट के विकास पर 2.3 करोड़ डॉलर की लागत आई थी जो उस जमाने में एक बड़ी रकम थी। लेकिन इसके डेवलपमेंट में काफी समय लग गया। आखिरकार यह 1946 में बनकर तैयार हुआ जबकि सेकेंड वर्ल्ड वॉर 1945 में खत्म हो चुका था। यही वजह है कि इस विमान पर किए गए भारी खर्च पर सवाल उठने लगे। ह्यूज से इसकी यूटिलिटी प्रमाणित करने के लिए कहा गया। आखिरकार ह्यूज ने 2 नवंबर, 1947 को इसका फ्लाइट टेस्ट किया।कैलिफोर्निया के लॉन्ग बीच हार्बर पर इसकी उड़ान देखने के लिए हजारों लोग जुटे थे। इसने पानी से उड़ान भरी और 70 फीट की ऊंचाई तक उड़ा। करीब एक मील उड़ने के बाद ह्यूज ने इसे उतार दिया। सफल उड़ान के बावजूद इसका कभी भी प्रोडक्शन नहीं किया गया। आलोचकों का कहना था कि लकड़ी का बना होने के कारण यह लंबी दूरी तय नहीं कर सकता है।

ह्यूज की जिद

लेकिन ह्यूज इसे मानने को तैयार नहीं थे। वह इसे एविएशन के क्षेत्र में अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते थे और इसे पूरी उम्र सीने से लगाए रहे। 1947 से 1976 में अपने निधन तक वह इस प्रोटोटाइप को एक हैंगर में हमेशा उड़ान के लिए तैयार रखते थे। इसके लिए वह सालाना 10 लाख डॉलर का किराया भी चुकाते थे। आज यह विमान ओरेगॉन के मैकमिनविले में Evergreen Aviation Museum में रखा गया है।


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