प्रॉपर्टी बेचने पर ₹1.70 करोड़ कैश लेने का आरोप, WhatsApp चैट भी नहीं आई काम, ITAT में केस हारा इनकम टैक्स विभाग

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नई दिल्ली।

प्रॉपर्टी बेचने के बाद अगर इनकम टैक्स विभाग आपसे पूछताछ करे कि आपने रजिस्ट्री में दर्ज रकम से ज्यादा पैसा नकद लिया है, तो मामला मुश्किल हो सकता है। ऐसा ही एक मामला दिल्ली में सामने आया, जहां एक पति-पत्नी पर प्रॉपर्टी बेचने के बदले 1.70 करोड़ रुपये नकद लेने का आरोप लगा। इस मामले में विभाग ने नोटिस भेजकर बड़ा जुर्माना लगाया।इनकम टैक्स विभाग ने वॉट्सऐप चैट, एक्सेल शीट और अन्य दस्तावेजों को आधार बनाया। हालांकि, दिल्ली की इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने सबूतों और कानूनी प्रक्रिया में खामियां पाते हुए असेसमेंट और पेनल्टी के आदेश रद्द कर दिए।

क्या था पूरा मामला?

दिल्ली में पति-पत्नी के संयुक्त स्वामित्व वाली एक संपत्ति बेची गई थी। रजिस्टर्ड सेल डीड में संपत्ति की कीमत 1.60 करोड़ रुपये दर्ज की गई थी। साल 2021 में इनकम टैक्स विभाग एक कॉर्पोरेट समूह पर छापा मारा। इस दौरान मिले दस्तावेजों, वॉट्सऐप चैट्स और ‘BOSS – DEC 18 onwards’ नाम की एक एक्सेल शीट के आधार पर विभाग ने आरोप लगाया कि संपत्ति का कुल सौदा 3.30 करोड़ रुपये में हुआ था।विभाग का कहना था कि 1.70 करोड़ रुपये (1.55 करोड़ + 15 लाख) का अतिरिक्त भुगतान नकद में किया गया था। असेसिंग ऑफिसर (AO) ने धारा 69A के तहत इस राशि को अघोषित आय मानकर टैक्स और पेनल्टी लगा दी। बाद में CIT (Appeals) ने करदाता को आंशिक राहत देते हुए 1.16 करोड़ रुपये की देनदारी बरकरार रखी, जिसके खिलाफ करदाता ने ITAT में अपील की।

ITAT में कैसे मिली जीत?

आईटीएटी दिल्ली ने अपने फैसले में टैक्स विभाग के आरोपों और प्रक्रियाओं में कई गंभीर खामियां पाईं। ट्रिब्यूनल ने पाया कि WhatsApp चैट्स और सीज किए गए दस्तावेजों में सिर्फ कुछ आंकड़े लिखे थे, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि ये आंकड़े किस लेन-देन के लिए थे। डिजिटल चैट में आंकड़ों का होना यह साबित नहीं करता कि नकद राशि वास्तव में करदाता को मिली ही थी।विभाग ने जिन लोगों के बयानों और चैट्स के आधार पर मामला बनाया, उन्हें न तो शपथ पर परीक्षित किया गया और न ही करदाता को उनसे सवाल-जवाब का अवसर दिया गया। यहां तक कि मुख्य गवाह को भी विभाग ने समन जारी नहीं किया था। वहीं करदाता का तर्क था कि संपत्ति की रजिस्ट्री 31 अक्टूबर 2019 को हुई थी, जो असेसमेंट ईयर 2020-21 में आती है, जबकि इनकम टैक्स विभाग ने इसे 2019-20 के लिए जोड़ दिया था।आईटीएटी ने पाया कि धारा 153C के तहत नोटिस जारी करने के लिए सात वर्षों का एक साझा ‘सैटिस्फैक्शन नोट’ बनाया गया था, लेकिन हर असेसमेंट ईयर से जुड़े आपत्तिजनक सबूत को अलग से स्थापित नहीं किया गया था। इन्हीं आधारों पर ट्रिब्यूनल ने पूरे टैक्स असेसमेंट और जुर्माने के आदेश को रद्द कर दिया।


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