मुकेश अंबानी का 2.73 लाख करोड़ रुपये का बड़ा दांव, जमीन के नीचे से गैस निकालेगी रिलायंस इंडस्ट्रीज
नई दिल्ली।
मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने देश को विदेशी ऊर्जा संकट से उबारने के लिए एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। रिलायंस ने आंध्र प्रदेश में भारत का पहला एकीकृत अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन (UCG) कॉम्प्लेक्स स्थापित करने के लिए अगले 30 वर्षों में लगभग 2.73 लाख करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव दिया है।रिलायंस ने नीलामी में आंध्र प्रदेश के एलुरु जिले के चिंतालपुडी और रेचेरला कोयला ब्लॉक्स हासिल किए हैं। रिलायंस के दोनों कोयला ब्लॉक काफी बड़े हैं। ये खदानें जमीन से आधा किलोमीटर गहराई में स्थित हैं। हालांकि इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी संभावना ही इसकी सबसे बड़ी चुनौती है। जमीन के अंदर गैस बनाने की प्रक्रिया को बड़े स्तर पर नियंत्रित करना आसान नहीं है।
कितने कोयले का अनुमान?
चिंतालपुड़ी ब्लॉक करीब 3000 एकड़ में फैला है और इसमें लगभग 90.49 करोड़ टन कोयला होने का अनुमान है। वहीं, रेचेरला ब्लॉक करीब 5500 एकड़ में है और इसमें करीब 222.57 करोड़ टन कोयले का अनुमान लगाया गया है। यानी दोनों ब्लॉक्स में कुल मिलाकर करीब 313 करोड़ टन कोयला होने का अनुमान है।
30 सालों में 3 चरणों में होगा निवेश
पहला चरण (2026-2027): 3000 करोड़ रुपये का पायलट और एक्सप्लोरेशन कार्य।
दूसरा चरण (2028-2030): सफल होने पर 1.2 लाख करोड़ रुपये का इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट।
तीसरा चरण (2030 से आगे): कमर्शियल उत्पादन के लिए 1.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश।
क्या है अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन?
पारंपरिक तरीके में कोयले की खुदाई करके बाहर निकाला जाता है और फिर गैस बनाई जाती है। लेकिन UCG में जमीन के नीचे पड़े कोयले को बिना खोदे सीधे जमीन के भीतर ही सीमित ऑक्सीजन और भाप डालकर गैस (सिनगैस) में तब्दील कर लिया जाता है और पाइप के जरिए बाहर निकाला जाता है।
भारत के लिए यह दांव क्यों अहम?
महंगे आयात पर निर्भरता खत्म होगा। भारत अपनी LNG जरूरत का 50% से ज्यादा, 20% यूरिया, लगभग पूरा अमोनिया और 80 से 90% मिथेनॉल बाहर से आयात करता है। सिनगैस से ये सभी चीजें घरेलू स्तर पर बनाई जा सकेंगी।
लाखों करोड़ रुपये की बचत होगी। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने इन रसायनों और ईंधनों के आयात पर लगभग 2.77 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे।
ऊर्जा संकट से बचाव होगा। वैश्विक युद्धों या खाड़ी देशों में तनाव के दौरान जब तेल-गैस की कीमतें आसमान छूती हैं, तब यह तकनीक देश की अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षा कवच का काम करेगी।
चुनौतियां और सबसे बड़ा जोखिम
आधा किलोमीटर यानी 500 मीटर से ज्यादा गहराई में अंडरग्राउंड रिएक्शन को नियंत्रित करना, भूजल को प्रदूषित होने से बचाना और गैस लीक न होने देना बहुत बड़ी तकनीकी चुनौती है। इसीलिए शुरुआती 3000 करोड़ रुपये का पायलट फेज इस प्रोजेक्ट की सफलता तय करेगा।
