न जंगल में घेराबंदी, न बड़ा सैन्य ऑपरेशन… एक एंबुलेंस ने कैसे किया कुख्यात वीरप्पन का अंत? ऑपरेशन कोकून की पूरी कहानी
नई दिल्ली।
घनी झाड़ियों, दुर्गम पहाड़ियों और जंगल के चप्पे-चप्पे से वाकिफ एक ऐसा खूंखार अपराधी, जिसे पकड़ने के लिए पुलिस सालों तक जंगलों की खाक छानती रही। उसके नाम से इलाके में खौफ था। हाथ में बंदूक, चेहरे पर घनी मूंछें और सिर पर कई लोगों की जान लेने और चंदन की तस्करी से जुड़े अपराधों का आरोप। लेकिन 18 अक्टूबर 2004 की रात उसकी जिंदगी का आखिरी अध्याय लिख दिया गया। यह नाम था कुख्यात चंदन तस्कर और हाथी दांत के शिकारी वीरप्पन का।वीरप्पन को मारने के लिए पुलिस सालों तक खाक छानती रही, लेकिन बार-बार वीरप्पन हाथ से निकल जाता था। लेकिन अंत में वीरप्पन को मारने के लिए पुलिस ने न तो जंगल में सीधे हमला किया और न ही किसी बड़े सैन्य अभियान के जरिए उसे घेरा। इसके बजाय ऐसी रणनीति बनाई गई, जिसने जंगल में अपनी मर्जी से राज करने वाले वीरप्पन को खुद उसके सुरक्षित ठिकाने से बाहर आने पर मजबूर कर दिया।कुख्यात चंदन तस्कर को अपनी आंख के इलाज की जरूरत, भरोसेमंद संपर्क और एक एंबुलेंस… ये तीन चीजें उस ऑपरेशन का अहम हिस्सा बनीं, जिसने देश के सबसे कुख्यात अपराधियों में शामिल वीरप्पन का अंत कर दिया।
आंख के इलाज की जरूरत बनी कमजोरी
वीरप्पन को पकड़ना तमिलनाडु और कर्नाटक पुलिस के लिए लंबे समय से बड़ी चुनौती था। जंगल के रास्तों की उसकी जानकारी, स्थानीय नेटवर्क और हथियारबंद साथियों की वजह से सुरक्षा बलों के लिए उसे घेरना आसान नहीं था। इसी बीच उसकी आंख में परेशानी की खबर एसटीएफ तक पहुंची। उसे इलाज के लिए जंगल से बाहर निकलना पड़ सकता था।तमिलनाडु की स्पेशल टास्क फोर्स ने इसी कमजोरी को अपने अभियान का आधार बनाया। तत्कालीन एसटीएफ प्रमुख के. विजय कुमार के नेतृत्व में पुलिस ने वीरप्पन के करीब पहुंचने और उसके भरोसेमंद लोगों के जरिए उसे बाहर लाने की योजना तैयार की। इस अभियान का नाम रखा गया ‘ ऑपरेशन कोकून ‘।पुलिसकर्मियों ने स्थानीय लोगों के बीच अपनी पहचान छिपाकर संपर्क बनाए। एक डॉक्टर के जरिए भी वीरप्पन को आंख के इलाज के लिए बाहर आने के लिए तैयार करने की कोशिश की गई। योजना यह थी कि उसे ऐसा लगे कि इलाज के लिए ले जाने वाले लोग उसके अपने संपर्कों से जुड़े हैं, जबकि असल में पूरा घटनाक्रम एसटीएफ की रणनीति का हिस्सा था।
एंबुलेंस में बैठते ही बिछ गया जाल
18 अक्टूबर 2004 की रात वीरप्पन अपने तीन साथियों के साथ जंगल से बाहर निकला। उसे भरोसा था कि इलाज के लिए ले जाने की व्यवस्था सुरक्षित है। जिस एंबुलेंस में उसे बैठना था, वह भी पुलिस की योजना का हिस्सा थी। उसे एक एसटीएफ कर्मी चला रहा था, जिसने अपनी असली पहचान छिपा रखी थी।वीरप्पन को शायद अंदाजा नहीं था कि जिस रास्ते को वह अपनी सुरक्षा के लिए चुन रहा है, उसी पर उसके इंतजार में हथियारबंद जवान तैनात हैं। एंबुलेंस तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले में पप्पारापट्टी के पास पहुंची। वहां एसटीएफ की टीम पहले से तैयार थी।तय योजना के मुताबिक एंबुलेंस को एक सुनसान जगह पर रोका गया। चालक वाहन से उतरकर वहां से हट गया। अब वीरप्पन और उसके साथियों के सामने पुलिस की टीम थी। जंगल में लंबे समय तक सुरक्षा बलों को चकमा देने वाला अपराधी इस बार ऐसी जगह फंस चुका था, जहां से निकलने का रास्ता आसान नहीं था।
सरेंडर की चेतावनी, फिर गोलियों की गूंज
एसटीएफ ने वीरप्पन और उसके साथियों को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा। लेकिन पुलिस के अनुसार, जवाब में एंबुलेंस के भीतर से गोलीबारी शुरू हो गई। इसके बाद सुरक्षा बलों ने भी जवाबी कार्रवाई की।रात के सन्नाटे में गोलियों की आवाज गूंजने लगी। एंबुलेंस को निशाना बनाकर की गई जवाबी फायरिंग के बीच वीरप्पन और उसके तीन साथी बच नहीं सके। करीब 20 मिनट तक चली मुठभेड़ में वीरप्पन मारा गया। उसके साथियों सेतुकुली गोविंदन, चंद्रे गौड़ा और सेतुमणि की भी मौत हो गई।वीरप्पन की मौत के साथ ही एक दशक से अधिक समय तक चले पुलिस के अभियान का भी अंत हो गया। अगले दिन इस खबर ने पूरे देश का ध्यान खींचा। जिस वीरप्पन को पकड़ना सुरक्षा बलों के लिए लंबे समय से चुनौती बना हुआ था, वह अब मारा जा चुका था।
