ब्लैक मनी बताकर आयकर विभाग ने लगाया ₹1.84 करोड़ का जुर्माना, ITAT में मिली हार, जानें पूरा मामला

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नई दिल्ली।

सिंगापुर में नौकरी के दौरान जुटाए गए पैसों से विदेशी फंड में निवेश करना गुरुग्राम के एक निवासी के लिए तब बड़ी मुसीबत बन गया, जब भारतीय आयकर विभाग ने इसे ‘काला धन’ घोषित कर दिया। आयकर विभाग ने उनके खिलाफ कार्रवाई करते हुए 1.84 करोड़ रुपये का भारी-भरकम जुर्माना लगा दिया। हालांकि, आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने इस मामले में आयकर विभाग की कार्रवाई को गैर-कानूनी ठहराते हुए करदाता को बड़ी राहत दी है।

क्या है पूरा मामला?

हरियाणा के गुरुग्राम में रहने वाले टैक्सपेयर अमित वर्मा (बदला हुआ नाम) ने सिंगापुर में अपनी नौकरी के दौरान 19 मई 2015 को बर्मुडा-केंद्रित एक ग्लोबल इन्वेस्टमेंट फंड में लगभग 3 लाख अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था। इसके बाद, 16 मार्च 2016 को उन्होंने यह निवेश भुनाया जिससे उन्हें 3.14 लाख डॉलर (करीब 3 करोड़ रुपये) प्राप्त हुए।

आयकर विभाग ने लगाया जुर्माना

  • भारत लौटने पर जब मामला आयकर विभाग के सामने आया, तो विभाग ने इसे अघोषित संपत्ति मानते हुए ‘ ब्लैक मनी एक्ट ‘ के तहत जांच शुरू कर दी।
  • अमित ने विभाग को स्पष्ट किया कि निवेश किया गया 3 लाख डॉलर का फंड उनकी सिंगापुर की सैलरी (कमाई) से आया था, जिसमें किसी भी भारतीय फंड का इस्तेमाल नहीं हुआ था।
  • उन्होंने भारत-सिंगापुर संशोधित दोहरा कराधान बचाव समझौते (DTAA) का हवाला भी दिया।
  • इनकम टैक्स अधिकारी (AO) अमित की दलीलों से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने कहा कि फंड कंपनी भारत में पब्लिक लिमिटेड के रूप में पंजीकृत थी और वित्त वर्ष 2015-16 के लिए अमित सिंगापुर के निवासी नहीं थे।
  • अधिकारी ने निवेश के फेयर मार्केट वैल्यू पर ब्लैक मनी एक्ट की धारा 3(1) के तहत 30% की दर से टैक्स लगाया और साथ ही 1.84 करोड़ रुपये का जुर्माना ठोक दिया।
  • इसके बाद कमिश्नर (अपील) ने भी अमित की अपील खारिज कर दी।

ITAT में कैसे पलटा मामला?

कमिश्नर (अपील) से राहत न मिलने के बाद अमित ने ITAT दिल्ली का रुख किया। करदाता के वकीलों ने तर्क दिया कि आयकर विभाग ने 1 नवंबर 2018 को ब्लैक मनी एक्ट की धारा 10(1) के तहत जो नोटिस जारी किया था, उसमें केवल मूल्यांकन वर्ष (AY) 2016-17 और 2017-18 का उल्लेख था। नोटिस में AY 2019-20 का कोई जिक्र नहीं था।चूंकि विभाग ने AY 2019-20 के लिए धारा 10(1) का कोई वैध नोटिस जारी ही नहीं किया था, इसलिए अधिकारी को उस वर्ष के लिए आकलन करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था। आईटीएटी ने धारा 10 के तहत शुरू की गई कार्रवाई, असेसमेंट ऑर्डर और 1.84 करोड़ रुपये के जुर्माने के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया।


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