क्या शेयर बाजार की बुल चाल रहेगी जारी या फिर पलटेगा पासा? अगले हफ्ते ये 5 ट्रिगर तय करेंगे मार्केट का भविष्य
नई दिल्ली।
बीते कारोबारी सत्र यानी कि शुक्रवार 9 अक्टूबर को घरेलू शेयर बाजार में जबरदस्त रिकवरी देखी। बाजार की इस तेजी से 50 शेयरों वाले निफ्टी और 30 शेयरों वाले सेंसेक्स की लगातार आठ हफ्तों से जारी गिरावट थम गई। इस दौरान आईटी, FMCG, ऑटो और फाइनेंशियल शेयरों में निवेशकों के द्वारा बड़ी खरीदारी से बेंचमार्क इंडेक्स ऊपर चढ़े।मार्केट बंद के दौरान निफ्टी 50 में 288.65 अंक यानी 1.30% की बढ़त दिखी और यह 22,520.45 पर बंद हुआ। वहीं, सेंसेक्स 879.09 अंक यानी 1.23% चढ़कर 72,472.33 पर बंद हुआ। एक्सपर्ट बताते हैं कि यह रिकवरी मुश्किल मैक्रो-इकोनॉमिक हालात के बीच हुई है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली जारी है, रुपया कमजोर दिखा है और सख्त आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी का असर भी बाजार पर पड़ रहा है।अब सवाल यह है कि क्या शुक्रवार की यह रिकवरी आने वाले हफ्ते में भी जारी रहेगी? आइए जानते हैं कि तेजी और मंदी की फाइट के बीच अगले हफ्ते बाजार का भविष्य कैसा हो सकता है और इसके लिए ये 5 ट्रिगर या फैक्टर बहुत मायने रख सकते हैं।
अगले हफ्ते मार्केट का भविष्य तय करेंगे ये 5 ट्रिगर
हमारे सहयोगी ईटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, हम यहां वे 5 कारक या वजहें बता रहे हैं, जो अगले हफ्ते D-Street (भारतीय शेयर बाजार) की किस्मत तय कर सकती हैं। इनमें ग्लोबल से लेकर घरेलू कारक मौजूद हैं। आइए अब इन्हें जानते हैं…
पश्चिम एशिया तनाव और कच्चे तेल की कीमत
घरेलू शेयर बाजार पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव और इससे कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी ने काफी बुरा प्रभाव डाला है। एक्सपर्ट बताते हैं कि भारतीय शेयर मार्केट के लिए कच्चे तेल की कीमतें एक बड़ी मैक्रो-इकोनॉमिक चिंता बनी हुई हैं। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 90 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर ट्रेड कर रहा है। ईरान, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और क्षेत्रीय एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर अनिश्चितता के कारण सप्लाई में रुकावट की आशंका बनी हुई है, जिसका असर महंगाई, इंपोर्ट बिल और रुपये पर पड़ सकता है।ईटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर ने कहा, “कच्चे तेल की कीमतों में फिर से बढ़ोतरी से महंगाई का दबाव बढ़ सकता है, रुपया और कमजोर हो सकता है और फ्यूल व इनपुट लागत के प्रति संवेदनशील सेक्टर पर असर पड़ सकता है।”उन्होंने कहा कि कीमतों में लगातार गिरावट से महंगाई और देश के इंपोर्ट बिल को लेकर चिंताएं कम होंगी, जिससे भारतीय इक्विटी मार्केट को काफी राहत मिलेगी। पोनमुडी ने आगे कहा कि कूटनीतिक कोशिशों से तनाव कम होने की कुछ उम्मीद जगी है, हालांकि एनर्जी शिपमेंट में और रुकावट का जोखिम बना हुआ है।
विदेशी निवेशकों का निवेश और घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी
रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी निवेशकों (FIIs) के द्वारा घरेलू शेयर बाजार से शेयरों की बिक्री यानी कि बिकवाली बाजार के लिए एक बड़ी चिंता बनी हुई है। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने इस बिकवाली के दबाव का ज्यादातर हिस्सा संभाल लिया है।आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर में अब तक FII ने लगभग 39,779 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी (net outflow) की है, जबकि इसी दौरान DII ने लगभग 40,355 करोड़ रुपये की खरीदारी की है, जिससे विदेशी बिकवाली का असर काफी हद तक कम हो गया है।बाजार की दिशा तय करने में घरेलू संस्थागत निवेशकों की इस समर्थन को बनाए रखने की क्षमता और विदेशी निवेशकों के निवेश में सुधार अहम रहेंगे। एक्सपर्ट पोनमुडी ने कहा कि US बॉन्ड यील्ड का ऊंचा स्तर भारतीय इक्विटी में विदेशी निवेश को सीमित कर सकता है, जबकि यील्ड में फिर से बढ़ोतरी डॉलर को मजबूत कर सकती है और रुपये पर और दबाव डाल सकती है।
अमेरिका में महंगाई और रिटेल-सेल्स के आंकड़े और रुपया
अगले हफ्ते ग्लोबल मार्केट के लिए अमेरिका में महंगाई और रिटेल-सेल्स के आंकड़े अहम होंगे, क्योंकि इनके मजबूत रहने पर ट्रेजरी यील्ड और डॉलर ऊंचे बने रह सकते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत में सितंबर के कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन (CPI) और होलसेल प्राइस इन्फ्लेशन (WPI) के आंकड़े घरेलू कीमतों के दबाव और मॉनेटरी पॉलिसी पर पड़ने वाले असर के बारे में संकेत देंगे।HST वेल्थ के CEO हरिसेल्वन राधाकृष्णन ने कहा कि उम्मीद से ज्यादा CPI रीडिंग से रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की ओर से और सख्ती बरतने की चिंताएं फिर से बढ़ सकती हैं। इससे बैंकिंग, ऑटोमोबाइल और रियल एस्टेट जैसे ब्याज दरों पर निर्भर सेक्टर दबाव में आ सकते हैं और कंज्यूमर डिमांड पर भी बुरा असर पड़ सकता है।एक्सपर्ट पोनमुडी ने कहा, “ग्लोबल बॉन्ड यील्ड विदेशी निवेश के प्रवाह की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।” उन्होंने बताया कि US की 10-साल की ट्रेजरी यील्ड हाल के 5.36% के पीक से घटकर लगभग 5.24% हो गई है, जिससे उभरते बाजारों की एसेट्स को कुछ राहत मिली है, हालांकि यील्ड अभी भी ऊंची बनी हुई है।वहीं, हरिसेल्वन ने कहा कि US में महंगाई और रिटेल-सेल्स के आंकड़े ट्रेजरी यील्ड और डॉलर की दिशा तय करेंगे।
पोनमुडी के अनुसार, रुपया, जो 97 रुपये प्रति डॉलर के आसपास ट्रेड कर रहा है, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, US की ऊंची यील्ड और विदेशी पोर्टफोलियो से लगातार हो रही निकासी के कारण दबाव में है। उन्होंने कहा कि करेंसी में ज्यादा टिकाऊ रिकवरी के लिए तेल की कीमतों और ग्लोबल यील्ड में ज्यादा स्थिरता के साथ-साथ विदेशी निवेशकों के निवेश में सुधार की जरूरत होगी।RBI की पॉलिसी पर भी सबकी नजर रहेगी। पोनमुडी ने बताया कि आरबीआई ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी करके इसे 5.50% कर दिया था और अपनी पॉलिसी को ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ (सोच-समझकर सख्ती) कर दिया था; यह लगभग चार साल में पहली बार था जब रेट बढ़ाए गए थे।यह कदम ग्लोबल अनिश्चितता के बीच एनर्जी और कमोडिटी की ऊंची कीमतों से महंगाई के जोखिम को लेकर बढ़ती चिंताओं को दिखाता है। इन्वेस्टर्स भविष्य के पॉलिसी फैसलों, लोन लेने की लागत और लिक्विडिटी पर इसके असर का आकलन कर सकते हैं, क्योंकि ऊंची ब्याज दरों का असर क्रेडिट-सेंसिटिव सेक्टर और कॉर्पोरेट फाइनेंसिंग की स्थितियों पर पड़ सकता है।
IT कंपनियों की कमाई और सेक्टर की तेजी
बीते शुक्रवार को आईटी कंपनी TCS के सितंबर तिमाही के नतीजे आने के बाद IT शेयरों में तेजी दिखी, जिससे बड़े इंडेक्स भी ऊपर चढ़े। अब सबकी नजरें HCL टेक्नोलॉजीज, विप्रो और टेक महिंद्रा पर हैं; इनके नतीजों और मैनेजमेंट की बातों से पता चलेगा कि क्या सेक्टर की रिकवरी में और तेजी आएगी।पोनमुडी ने कहा कि जैसे-जैसे सितंबर तिमाही के नतीजे आने का दौर तेज होगा, कॉर्पोरेट की कमाई सेक्टर के परफॉर्मेंस पर ज्यादा असर डालेगी। निवेशक अलग-अलग सेक्टर में कमाई की मजबूती, डिमांड में सुधार और मार्जिन में स्थिरता के संकेत देखेंगे।हरिसेल्वन ने कहा कि IT सेक्टर की रिकवरी इस बात पर निर्भर करेगी कि दूसरी कंपनियां कैसा परफॉर्मेंस करती हैं और आने वाली तिमाहियों के लिए उनका क्या आउटलुक है। उन्होंने कहा, “US में गैर-जरूरी खर्च (discretionary spending), डील कन्वर्जन और मार्जिन पर मैनेजमेंट की बातें अहम होंगी।”उन्होंने भारतीय IT कंपनियों पर PERM सस्पेंशन के संभावित असर की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि हालांकि इस रोक का मौजूदा H-1B रोजगार पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन अगर यह रोक लंबे समय तक जारी रहती है, तो लोकलाइजेशन और कर्मचारियों को बनाए रखने की लागत बढ़ सकती है।
टेक्निकल नजरिए से अगले हफ्ते निफ्टी की चाल
हमारे सहयोगी ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार को निफ्टी 50 में जबरदस्त रिकवरी देखी गई, जिससे लगातार आठ हफ्तों से जारी गिरावट का सिलसिला थम गया। हालांकि, इसका टेक्निकल स्ट्रक्चर अभी भी कमजोर बना हुआ है क्योंकि इंडेक्स अपने अहम मूविंग एवरेज से नीचे ट्रेड कर रहा है। इसलिए, इस रिकवरी को ट्रेंड में पक्के बदलाव (ट्रेंड रिवर्सल) के तौर पर देखने में सावधानी बरतनी चाहिए।
पोनमुडी के अनुसार, निफ्टी 50 के लिए तुरंत रेजिस्टेंस जोन 22,600 के आसपास है, और उसके बाद 22,800 का स्तर आता है। अगर इंडेक्स 22,800 के ऊपर लगातार बना रहता है, तो रिकवरी मजबूत हो सकती है और 23,000 के स्तर तक पहुंचने का रास्ता खुल सकता है। शॉर्ट-टर्म टेक्निकल स्ट्रक्चर में ज्यादा ठोस सुधार का संकेत पाने के लिए इंडेक्स को 23,000 के स्तर को फिर से हासिल करना होगा और उसके ऊपर बने रहना होगा।नीचे की तरफ, पोनमुडी ने 22,400 को तुरंत सपोर्ट जोन बताया है, जिसके बाद 22,200 और मनोवैज्ञानिक रूप से अहम 22,000 का स्तर आता है। अगर इंडेक्स 22,200 के नीचे जाता है, तो बिकवाली का दबाव फिर से बढ़ सकता है और इंडेक्स निचले स्तरों तक जा सकता है।उन्होंने बताया कि शुक्रवार की रिकवरी के बाद मोमेंटम इंडिकेटर्स में ‘ओवरसोल्ड’ स्थिति से सुधार हुआ है। हालांकि, व्यापक ट्रेंड अभी भी अहम मूविंग एवरेज से नीचे है, इसलिए निकट भविष्य के लिए नजरिया सतर्कता वाला बना हुआ है, जिसमें 22,600–22,800 का जोन पहली अहम रुकावट के तौर पर काम करेगा।
डिस्क्लेमर: इस विश्लेषण में दिए गए सुझाव व्यक्तिगत विश्लेषकों या ब्रोकिंग कंपनियों के हैं, एनबीटी के नहीं। हम निवेशकों को सलाह देते हैं कि किसी भी निवेश का निर्णय लेने से पहले प्रमाणित विशेषज्ञों से परामर्श कर लें। क्योंकि शेयर बाजार की परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं।
