काव्योपाध्याय हीरालाल क़ी उपलब्धियों को लेकर आयोजित हुई संगोष्ठी
रायपुर ।
छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रथम व्याकरणाचार्य काव्योपाध्याय हीरालाल के उपाधि दिवस (11 सितंबर 1884) का स्मरण करते हुए मूलवासी कलमकार संस्थान द्वारा 6 सितंबर को भोला कुर्मी छात्रावास रायपुर में छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को लेकर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।मूलवासी कलमकार संस्थान के अध्यक्ष डॉ. पंचराम सोनी एवं सचिव जयंत साहू ने संयुक्त रूप से विज्ञप्ति जारी कर जानकारी दी कि इस अवसर पर धमतरी जिले के छोटे से गांव राखी में 1856 में जन्मे हीरालाल चन्नाहू ने सन 1885 में ही छत्तीसगढ़ी का व्याकरण लिख दिया था। हीरालाल की लेखनी का लोहा मानते हुए बंगाल के राजा सुरेंद्र मोहन टैगोर की संस्था द्वारा उन्हें 11 सितंबर 1884 को ‘काव्योपाध्याय’ की उपाधि प्रदान कर स्वर्ण बाजूबंद से सम्मानित किया गया था। इतना ही नहीं, दुनिया के सबसे बड़े भाषाशास्त्री सर जॉर्ज ग्रियर्सन द्वारा उनकी कृति को 1890 में अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया था।इस अवसर पर काव्योपाध्याय हीरालाल के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति उनके योगदान का स्मरण किया गया। कार्यक्रम में चंद्रशेखर चकोर, गोविंद धनगर, दास मनोहर, किसलाल कुर्रे, नारायण सिंह वर्मा, रमेश कुमार साहू, कमलेश कुमार धुर्वे, गणेश सोनकर, राजेन्द्र देवांगन, परमेश्वर कोसे, घनश्याम वर्मा, डॉ. अनिल भतपहरी, डॉ. नरेश साहू, रघुनंदन साहू, जयंत साहू, डॉ. पंचराम सोनी आदि ने अपने विचार रखे।
