जसम के आयोजन में कवियों और शायरों ने समां बांधा
रायपुर।
विगत दिनों जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई द्वारा सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक आलोक विमल के निवास पर शायरी एवं कविता पाठ का आयोजन किया गया। इस आयोजन में छत्तीसगढ़ के नामचीन शायरों और कवियों ने अपनी धारदार रचनाओं से समां बांधा।
मशहूर शायर सुखनवर हुसैन रायपुरी ने बेहद सधी हुई आवाज़ में जीवन की सच्चाई को कुछ यूं बयां किया-
बड़े बड़ों को ये शायद
पता नहीं होता
किसी को मार के
कोई बड़ा नहीं होता
न जाने कौन सा लम्हा हो
आख़िरी लम्हा
किसी को मौत का
अपनी पता नहीं होता
हमारे बच्चों को संगत
बिगाड़ देती है
कोई भी बच्चा
मिज़ाजन बुरा नहीं होता।
नामचीन शायर आलिम नकवी ने अपने जज्बातों को कुछ यूं बयां किया-
ताज़ा फिर वैसी रवायत
नहीं करने वाला।
मैं तेरे खौफ़ से हिजरत
नहीं करने वाला
सर सलामत न रहे,
यह तो है मुमकिन “आलिम”
ज़ुल्म के हाथ पे
बैअत नहीं करने वाला।
उन्होंने अपने एक और शेर को पढ़कर खूब वाहवाही लूटी-
कोई मौक़ा हो,महल हो
तो ग़ज़ल होती है
दिल की जानिब से पहल हो
तो ग़ज़ल होती है
लाख लफ़्ज़ों से सँवारो
यह संवरती कब है।
सामने जाने ग़ज़ल हो
तो ग़ज़ल होती है।
युवा शायर मीसम हैदरी ने भारतीय रेलगाड़ी को हिन्दुस्तान की आत्मा निरुपित करते हुए शानदार रचना पढ़ी। उनकी व्यंग्य रचनाओं ने भी खूब हंसाया। शायर इमरान अब्बास ने जानदार ग़ज़लें पढ़ी। उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल में फ़रमाया-
फ़ायदा क्या है
ऐसे मुहाफ़िज़ का आख़िर
लुट जाती है इज़्ज़त
वो तब आते हैं।
युवा रचनाकार अल्तमश ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, मदन मोहन दानिश और राहत इंदौरी साहब की रचनाओं का पाठ कर समां बांधा। वरिष्ठ शायर आरडी अहिरवार ने भी समय और समाज की विसंगतियों को उजागर करने वाली रचनाओं का पाठ किया। जेन-जी को केंद्र में रखकर लिखी गई उनकी रचना खूब पसंद की गई।
सफाई कामगारों को केंद्र में रखकर बेहतरीन काम करने वाले संजीव खुदशाह ने दोगले सीरीज पर कई रचनाएं सुनाई। मनुवादी चरित्रों को लेकर पढ़ी गई उनकी कविताओं को सबने पसंद किया। डॉ. पूनम संजू ने बस्तर की एक आदिवासी युवती को लेकर झकझोर देने वाली रचना का पाठ किया। कविता का भाव कुछ यूं था-
तुम्हारे बारे में मैं इतना जानती थी जितना मंच ने, किताबों ने, विभागों ने संस्थाओं ने बताया
लेकिन पिछले वे दिन जब तुमसे हुई रूबरू
जाना बीहड़ का
रहन-सहन।
तुमने,अपने वजूद को
खुद के होने को सम्हाल रखा है।तुम्हारी आहट अब भी मेरे भीतर चहलकदमी कर रही है।
जेन-जी पीढ़ी की समर्थ युवा कवियित्री सिमरन भगत ने भी व्यवस्था को चोट करती हुई रचनाएं बांची। बानगी देखिए-
चुनावों और भाषणों में यह जो गला फाड़ के चिल्लाते हैं
क्यों इंसाफ की घड़ी में
गूंगे बहरे हो जाते हैं।
नोट बदल दिए गए रातों-रात निर्णय तो यह काफी जल्द हो गया
इंसाफ में लग जाते हैं काफी साल इसलिए चुपके से जला दिया उसे
मगर साथ उसके कानून भी लाश बनकर गहरी नींद में सो गया।
संस्कृतिकर्मी राजकुमार सोनी ने मुड़ा तुड़ा नोट और जरूरी काम शीर्षक से कविताओं का पाठ किया। कवि भागीरथी वर्मा ने बहुत ही सरल शब्दों में मजदूरों का शोषण करने वालों के ख़िलाफ़ अपनी कविता में आवाज़ उठाई।
वर्षा बोपचे ने ‘ अगर हो सकें तो कोई शमां जलाइए…गीत प्रस्तुत किया। इसके अलावा उन्होंने शायर आलिम नकवी की एक ग़ज़ल-मैं ऐसे ख्वाब क्यों कर देखता हूं का शानदार पाठ भी किया। समीक्षा नायर ने शलभ श्रीराम सिंह की मशहूर रचना नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम को बहुत ही शानदार ढंग से प्रस्तुत किया।
युवा शायर मोहम्मद मुसय्यब ने कुछ यूं अपनी धारदार ग़ज़ल बांची-
फरेब ओ मक्र कि
जो भी दुकान रखते हैं
अदब से मिलते हैं
मीठी ज़बान रखते हैं।
वो ज़िन्दा लाश हैं
जो ज़ुल्म पे खमोश रहें
वगरना गूंगे भी मुँह में
ज़बान रखते हैं।
हमारे मुल्क में रहते हैं
एक साथ सभी
हम अपने सीनों में
हिन्दोस्तान रखते है।
जन संस्कृति मंच छत्तीसगढ़ की अध्यक्ष रूपेंद्र तिवारी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में वर्तमान समय की चिंताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि एक अच्छा रचनाकार अपने समय से जूझता है और तमाम तरह की विसंगतियों के ख़िलाफ़ हस्तक्षेप दर्ज करता है। इस मौके पर उन्होंने अपनी ग़ज़ल का पाठ भी किया-
आज सूरज से ढिठाई की
रोशनी के लिए लड़ाई की
मोल समझा न रोशनाई का
ये तुमने कौन सी पढ़ाई की।
जसम रायपुर के सचिव इंद्रकुमार राठौर ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन आलोक विमल ने किया।
