बत्ती मैंने पहले बुझाई, फिर तुमने… अंतिम समय तक लिखते रहे विनोद कुमार शुक्ल, अस्पताल से लिखी आखिरी पंक्ति
रायपुर ।
महान हिंदी कवि, कथाकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता विनोद कुमार शुक्ल का निधन हो गया है. वे 88 साल के थे और पिछले कुछ दिनों से गंभीर हालत में रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में भर्ती थे. AIIMS प्रशासन के अनुसार वह सांस की बीमारी और दूसरी कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे. उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है. हालांकि वह अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अस्पताल में लिखी उनकी आखिरी पंक्तियां लोगों के दिलों में बसी हुई हैं।
अंतिम समय तक लिखते रहे विनोद कुमार शुक्ल
दरअसल, विनोद कुमार शक्ल जी के भीतर लिखने की तड़प इतनी तीव्र थी कि अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी उनका कलम नहीं रुका. 6 दिसंबर को उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था, “बत्ती मैंने पहले बुझाई, फिर तुमने बुझाई, फिर दोनों ने मिलकर बुझाई…”. यह लाइन उनके आखिरी पलों की शांति और विदाई का एक खूबसूरत चित्रण है. साथ ही यह लाइन उनकी क्रिएटिव ज़िंदगी की आखिरी निशानी बन गई।
दिलों को गहराई से छू गई अंतिम पंक्तियां
विनोद कुमार शुक्ल जिनका जन्म 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में हुआ था, उन्होंने कविता और गद्य दोनों में अपनी एक खास पहचान बनाई थी. उनकी भाषा सरल थी, फिर भी उसमें गहरे मानवीय भाव और जीवन के सूक्ष्म अनुभव शामिल थे. उन्होंने अपनी रचनाओं में रोज़मर्रा की ज़िंदगी, आम लोगों और उनकी अंदरूनी दुनिया को अनोखे तरीके से पेश किया. विनोद जी सिर्फ़ एक लेखक ही नहीं, बल्कि हिंदी भाषा की सादगी में एक महान इनोवेटर भी थे. उनके निधन से साहित्य में एक ऐसे युग का अंत हो गया, जिसने रोज़मर्रा की ज़िंदगी की छोटी-छोटी बातों को कविता में बदल दिया. और उनके आखिरी दिनों में लिखी गई ये पंक्तियां, “पहले मैंने बत्ती बुझाई, फिर तुमने बुझाई, फिर हम दोनों ने मिलकर बुझाई…”, लोगों के दिलों को गहराई से छू गई हैं।
