मोबाइल की लत छुड़वाने हफ्ते में एक दिन करें डिजिटल उपवास

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भिलाई।

 युवाओं के लिए मौजूदा दौर की सबसे बड़ी बीमारी स्मार्टफोन है। भले ही युवा रील्स के पीछे पागल है, लेकिन आने वाले समय में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया युवाओं को नोमोफोबिया, फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम, सोशल मीडिया की थकान जैसी दर्जनों बीमारियां देगा। सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन साथ मिलकर एक तरफ जहां युवाओं मेें साइकोलॉजिकल समस्याएं पैदा करेगा, वहीं व्यक्तिगत विकास और सामाजिक संबंधों को भी बड़ा नुकसान पहुंचाएगा। इसलिए हफ्ते में एक बार डिजिटल उपवास कीजिए। ये बातें क्लिनिकल साइकोलॉजी के प्रोफेसर और शट क्लीनिक (देश का पहला टेक डि-एडिक्शन क्लीनिक), निमहांस बेंगलूरु के प्रोफेसर मनोज कुमार शर्मा ने कही।

वे आईआईटी भिलाई में स्मार्ट फोन के दुष्प्रभाव को लेकर रखे गए एक्सपर्ट टॉक में बोल रहे थे। उन्होंने सत्र में स्मार्टफोन और आधुनिक जीवन के बीच जटिल संबंधों पर बात की। उन्होंने कहा कि परिवार के सभी सदस्य तय कीजिए कि हफ्ते में एक दिन मोबाइल फोन का उपयोग सिर्फ फोन बजने पर बातचीत के लिए करेंगे। ना इंटरनेट होगा और ना ही गेम्स।

संतुलन बनाने का आग्रह

प्रो. शर्मा ने एक्सपर्ट टॉक के दौरान स्मार्टफोन के स्वस्थ उपयोग को बढ़ावा देने के लिए रणनीतियों को अपनाने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने युवाओं और फैकल्टी से डिजिटल सुविधा और वास्तविक मानवीय संपर्क के बीच संतुलन बनाने का आग्रह किया।

हर दिन बनाइए डी-एडिक्शन गोल

लत छुड़वाने हर दिन मोबाइल फोन के इस्तेमाल के घंटे तय हों।

उन लक्षणों को पहचाने जिससे मोबाइल की ओर हो रहे आकर्षित।

सामाजिक मेलजोल बढ़ाकर भी लत बचने में कारगर हो सकती है।

खाली समय का उपयोग पसंदीदा कामों में लगाएं।

इन चुनौतियों पर किया मंथन

हम स्मार्टफोन का कितना उपयोग कर रहे हैं और यह कितना अधिक है।

क्या हम सामाजिक अलगाव के उच्च स्तर का अनुभव कर रहे हैं।

क्या हम वास्तविक दुनिया में सार्थक संबंध खो रहे हैं।


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